Red tape and restrictions: India’s Foreign Contribution Regulation Act is preventing NGOs from doing their vital work

Home of Hope, Chennai, is a church-based non-governmental organisation (NGO) that helps underprivileged children and orphans with monthly sponsorship feeding programs, and helps women with microloans. Like many NGOs, Home of Hope relies on funds from generous donors across the globe to sustain their work, but the Indian government is making life increasingly difficult for this and many organisations like it.

Since amendments to the Foreign Contribution (Regulation) Act (FCRA) came into effect in September 2020, things have been different. Two boys receiving support from Home of Hope were prevented from sitting their final examinations in September as they were unable to receive the funds that helped pay their fees on time. Several other critical needs, such as healthcare for COVID-19 patients, were also left unmet due to the delay in funds. 

Of course, Home of Hope is not the only organisation affected by the new regulations. A majority of Christian charities, organisations and even educational institutions in India are funded by international donors, relying on them to survive. The FCRA amendments have made it almost impossible for them to function. 

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India’s reservation policy is meant to help Dalits, as long as they don’t convert to Christianity or Islam

In June, we published a blog post detailing the history of Dalit conversion in India and how this can often be an act of self-liberation for members of this historically underprivileged community. This continues to this day, however there are those in the community, particularly those who convert to Christianity or Islam, who can continue to face discrimination and hardship even after conversion.

For this blog, we spoke to a Christian who works on Dalit and other human rights issues in the country, who shared some of her own experiences and shed light on the issues that persist for Dalits in India today.

“Growing up as a Christian in India, there were some decisions that you had to make early on in life. One such decision was what I would put my caste down as in my school’s admission form. I was taught that we are all God’s children and we are all equal, but why was I being asked to classify myself? I was a Christian, so I ticked the box that said OC (Other Caste) because we were taught that Christians don’t have castes and that was the only sensible option available. Also, because I was privileged to not know what caste I belong to. 

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Conversion as an act of self-liberation: A history of the Dalit community in India

On 7 June 2020, a Dalit Christian man named Bura Singh, his wife and daughter were conducting prayers in their house in Madhya Pradesh, India, when police officials barged in and beat them up.

For Bura, his conversion to Christianity was a matter of faith. For many other Dalits like him, however, conversion to a religion other than Hinduism is not just a matter of faith, it’s also a means – the only means – to escape the centuries-old harassment and injustice meted out to them under the caste system.

Historically, and even today, Dalits who choose to convert to another religion are socially boycotted and harassed. But to understand why there is so much opposition to Dalit conversion by the upper castes, we must understand the origins of the caste system and the history of the Dalit struggle.

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राष्ट्र जीतने के लिए घर वापसी का सहारा

२०१४, में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई, तब विश्व हिन्दू परिषद् के पूर्व अध्यक्ष प्रवीन तोगड़िया ने कहा कि उनकी संस्था भारत को १००% हिन्दू देश बनाने में कार्य करती रहेगी। पिछले छह वर्षों में हिंदूवादी राष्टवाद के दर्शन को लेकर बयानबाज़ी और भी तेज़ होती जा रही है। उन पुराने कथनों के आधार पर कि सभी भारतीय अपने धर्मों और आस्थाओं के बावजूद हिन्दू है, मुस्लिम लव जिहाद अभियान का डर कि कहीं इस्लामिक प्रभाव मजबूत न हो जाए और मसीहियत को बढ़ाने के लिए पश्चिमी देशों से प्राप्त सहयोग का डर।

विदेशी मिशनरियों के बारे में (गलत) जानकारी, जिसके कारण ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी,ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटो की 1999 में उड़ीसा (अब ओडिशा) में भयावह हत्या कर दी गयी, यह ईसाइयों के प्रति संदेह और हिंसा में वृद्धि का चिन्ह है। झारखंड (२०१७),उत्तराखंड (२०१८) और उत्तर प्रदेश (२०२०), और मध्य प्रदेश (२०२१) और गुजरात (२०२१) में मौजूदा कानूनों में कठोर संशोधन करने वाले कानूनों को लागू किया गया, आस्था की सीमाएं बड़ी तेज़ी से राज्य {सरकार} की रूचि में शामिल हो गयी हैं। अन्य राज्यों द्वारा इस रुझान को आगे बढ़ाने की संभावना है, जिसके तहत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को राज्यों में होने वाले चुनावों में अधिक वोट पाने की आशा है

कानून/विधि के विपरीत, “घर वापसी” या “घर वापस आना” जैसे समारोहों के मुद्दे विहिप और उसके युवा उग्रवादी, बजरंग दल जैसे हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा हिन्दू राष्ट्र की पुनः घोषणा करने के प्रयास में इस्तेमाल किए जाने वाले बहाने बन गए हैं, जिसमें वे ईसाई और मुसलमानों को मारते पीटते हैं। आर.एस.एस. की हिंदुत्व विचारधारा, जो हिंदुओं को अन्य धर्मों और आस्थाओं से बेहतर मानते हैं उनका कहना है कि वे लोगों को परिवर्तित नहीं करते हैं लेकिन उन्हें उनके मूल विश्वास पर लौटने में मदद करते हैं। विहिप के उपाध्यक्ष चंपत राय के अनुसार, संगठन की स्थापना का प्राथमिक उद्देश्य “घर वापसी” अभियान है, जो स्थानीय जाँच सूत्रों का कहना है कि यह एक समस्या है जो मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और आदिवासी समुदायों को घेरती है, जो बहुत ही गरीब हैं और या तो वे बिलकुल अनपढ़ है या बहुत ही कम शिक्षित हैं। झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के आदिवासी राज्यों को आमतौर पर घर वापसी समारोहों के लिए बड़े केंद्र के रूप में जाना जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश को, अनुसूचित जाति के उच्च घनत्व के कारण ऐसी घटनाओं की सबसे अधिक संख्या दर्ज करने के लिए जाना जाता है। जबकि घर वापसी को प्रभावित करने वाले कारक जटिल और कठिन हैं, कुछ रुझान, हिंदू राष्ट्रवादियों के समूहों द्वारा इस्तेमाल किए गए तरीकों को प्रकट करते हैं। सोशल मीडिया प्रचार और भय की रणनीति को शामिल करते हुए, उनके अभियान मौलिक स्वतंत्रता और अधिकारों को कमजोर करते हैं।

घर वापसी बयानबाजी में चित्रित एक सामान्य विधि पुनः परिवर्तन की संख्या के बारे में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे करना है। 15 मार्च 2021 को गढ़वा जिला, झारखंड में नवभारत टाइम्स ने रिपोर्ट किया कि 35 आदिवासी परिवारों के 181 लोगों को “सरना” (प्रकृति पूजा) के लिए वापस लाया गया, जिसे स्थानीय जांच सूत्रों ने संख्याओं की अतिशयोक्ति के रूप में खारिज कर दिया है। हिन्दू राष्ट्र का उद्देश्य प्रगति कर रहा है, यह बात दर्शाने के लिए सोशल मीडिया पर ऐसी ख़बरों के पुनः प्रसारण किया जाता है यह दर्शाते हुए कि जैसे यह एक हालिया घटना है जिसका उपयोग समर्थकों का विश्वास हासिल करने के लिए किया जाता है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, एक वीडियो के प्रचार में, खाला गाँव, धुर्की जिले, झारखण्ड में २७ मसीहियों के घर वापसी के बारे में सोशल मिडिया में दोहराया गया जिससे वे जनता को गुमराह कर सके, जबकि सत्य यह था कि केवल ६ लोगों को पुनःवापसी की गयी थी।

कई बार, घर वापसी को उचित ठहराने के लिए झूठे आख्यानों की रचना की जाती है, जिससे आदिवासी समुदायों को ईसाई धर्म को बदनाम करने और इसे खुलकर बताने के लिए मजबूर किया जाता है। 16 मार्च 2021 को, झारखंड के चतरा में लगभग 50 आदिवासी महिलाओं और पुरुषों को यह कहने के लिए विवश किया गया था कि उन्हें ईसाई धर्म में प्रलोभन के द्वारा लाया गया था और अब वह पुनः अपने धर्म में जाने का निर्णय ले चुके हैं। स्थानीय जाँच सूत्रों का कहना है कि इस तरह के परिणाम हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा प्रतिशोध लेने के डर के परिणामस्वरूप लगातार उत्पीड़न के रूप में सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए,”धर्मांतरण” को मातृभूमि में घुसपैठ और हिंदू धर्म के पूर्व-अस्तित्व के लिए एक संभावित खतरा माना जाता है। आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार अल्पसंख्यकों को घुसपैठियों के रूप में संदर्भित करते हुए हिंदुओं को धर्मांतरित नहीं करने की चेतावनी दी थी। चूंकि राज्य चुनावी प्रक्रिया में राजनीतिक बिंदु हासिल करने के लिए भाजपा के खेमे से धर्मांतरण पर बहस जारी है, भारत का धर्मनिरपेक्षता का ताना बाना विघटित हो रहा है जिसका प्रतिकूल प्रभाव विचार, विवेक और धर्म के चुनाव की स्वतंत्रता पर पड़ रहा है। एक खेल के मैदान के साथ जो भारतीय संविधान के वास्तुकारों द्वारा परिकल्पित किया गया था, लोगों की आत्मा के लिए लड़ाई उन नियमों पर आधारित है जो हिंदू राष्ट्रवाद द्वारा तय किए गए हैं और जो सम्पूर्ण मीडिया को नियंत्रित करते है, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों को अधीनता में रहने के लिए धमकाते हैं।

The death of secularism in India: ‘Homecoming’ in the name of the Hindu rashtra

In 2014, months after the Bharatiya Janata Party (BJP) came into power, Praveen Togadia, the former President of the Visha Hindu Parishad (World Hindu Council [VHP]), said that his organisation will work towards making India a 100% Hindu nation.

This vision of a Hindu rashtra (nation) has continued to intensify over the past six years, with rhetoric promoting old narratives that all Indians are Hindus despite their religion or belief, as well as suggestions that Muslims in the country are perpetrating a “love jihad” campaign to strengthen Islamic influence, and that Western governments are providing support for the proselytisation of Christianity.

Misinformation and disinformation have been rife in India for decades. In 1999, false assertions about foreign missionaries preceded the horrific killing of the Australian Graham Staines and his two sons in Orissa (now Odisha). This marked a rise in suspicion towards and violence against Christians, which has continued to date.

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