“Jai Shri Ram” on the streets of Leicester as India’s Hindu nationalism stretches beyond its borders

“Jai Shri Ram”, translating from Hindi as “hail Lord Ram” or “victory to Lord Ram”, is meant to be a harmless informal greeting, a proclamation of one’s faith and an expression of praise for a well-known Hindu deity.

Sadly, the expression has taken on far more sinister connotations in recent years. For far-right Hindu nationalists in India, who have been significantly emboldened over the past eight years under Prime Minister Narendra Modi and his ruling Bharatiya Janata Party (BJP), the slogan has been appropriated as a rallying cry for violent extremists.

CSW receives regular reports of communal violence in which the perpetrators have either chanted those three words while carrying out their attacks, or in some cases pressured their victims to declare them, forcing them to contradict their own religion or belief.

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India at 75: A nation under siege

India celebrates its 75th year of independence from the British on 15 August. Every year this day is commemorated by remembering the innumerable sacrifices Indians made in their pursuit of freedom and self-rule. But year after year the question of whether this is the vision of India that the nation’s forefathers and freedom fighters gave their lives for becomes ever more pressing.

Even as there was much to celebrate on 15 August 1947, independence came with a heavy price. Just a day before, on 14 August, India was torn into two; the painful partition of India and Pakistan along the lines of religion has continued to have profound effects on the lives of people on both sides.

If anything, 75 years later, these communal divides seem to be growing bigger. There has been much debate on the partition in the intervening decades – who is to blame, what went wrong and what could have been done. But just as the debates continue, the hatred continues to grow.

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The failure of the Karnataka authorities to stand against religious intolerance has yielded sad yet expected results

Incidents of communal violence have risen sharply in Karnataka state in recent months, and anti-Muslim sentiments are on the rise.

First there was the hijab controversy that began on 28 December 2021 when the authorities of an educational institution in Udipi, Karnataka banned six Muslim girls from entering with their hijabs (headscarves) on. Several other colleges followed suit with bans that were upheld by the Karnataka High Court on 15 March 2022.

State-sanctioned intolerance    

Ministers in the ruling Bharatiya Janata Party (BJP), meanwhile have not shied away from expressing their radical agenda. In February 2022 the senior BJP leader in Karnataka, K S Eshwarappa, said that a day would come when the ‘saffron’ flag (a symbol of Hindu nationalism) would become the national flag.

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New Education Policy 2020: A subtle attempt to reshape India’s collective thinking

In July 2020, Indian Prime Minister Narendra Modi and his government released a 62-page ‘New Education Policy’ (NEP) to much excitement. It had been 34 years since the last education policy was rolled out, so the excitement was understandable.

On the surface, the policy looks grand and attractive. It speaks of reformation and becoming a ‘Global Knowledge Superpower’. However, India’s religious minorities are dissatisfied. In the 18 months since its release, there have been several protests against it by Muslim and Christian groups, claiming that they have been left out of the central government’s glorious vision for the future. 

Here are some of the key concerns. 

Lack of representation of religious minorities

While the 1986 education policy focused on giving minorities and women access to education, reducing child drop out rates and introducing education for adults, the NEP 2020 seems to focus more on technology, new-age curricula and innovation, with hardly any specific agenda to uplift members of minority communities. In fact, the word ‘minority’ is only mentioned twice and ‘Muslim’ is mentioned once – ironically to admit that they are under-represented. 

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राष्ट्र जीतने के लिए घर वापसी का सहारा

२०१४, में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई, तब विश्व हिन्दू परिषद् के पूर्व अध्यक्ष प्रवीन तोगड़िया ने कहा कि उनकी संस्था भारत को १००% हिन्दू देश बनाने में कार्य करती रहेगी। पिछले छह वर्षों में हिंदूवादी राष्टवाद के दर्शन को लेकर बयानबाज़ी और भी तेज़ होती जा रही है। उन पुराने कथनों के आधार पर कि सभी भारतीय अपने धर्मों और आस्थाओं के बावजूद हिन्दू है, मुस्लिम लव जिहाद अभियान का डर कि कहीं इस्लामिक प्रभाव मजबूत न हो जाए और मसीहियत को बढ़ाने के लिए पश्चिमी देशों से प्राप्त सहयोग का डर।

विदेशी मिशनरियों के बारे में (गलत) जानकारी, जिसके कारण ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी,ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटो की 1999 में उड़ीसा (अब ओडिशा) में भयावह हत्या कर दी गयी, यह ईसाइयों के प्रति संदेह और हिंसा में वृद्धि का चिन्ह है। झारखंड (२०१७),उत्तराखंड (२०१८) और उत्तर प्रदेश (२०२०), और मध्य प्रदेश (२०२१) और गुजरात (२०२१) में मौजूदा कानूनों में कठोर संशोधन करने वाले कानूनों को लागू किया गया, आस्था की सीमाएं बड़ी तेज़ी से राज्य {सरकार} की रूचि में शामिल हो गयी हैं। अन्य राज्यों द्वारा इस रुझान को आगे बढ़ाने की संभावना है, जिसके तहत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को राज्यों में होने वाले चुनावों में अधिक वोट पाने की आशा है

कानून/विधि के विपरीत, “घर वापसी” या “घर वापस आना” जैसे समारोहों के मुद्दे विहिप और उसके युवा उग्रवादी, बजरंग दल जैसे हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा हिन्दू राष्ट्र की पुनः घोषणा करने के प्रयास में इस्तेमाल किए जाने वाले बहाने बन गए हैं, जिसमें वे ईसाई और मुसलमानों को मारते पीटते हैं। आर.एस.एस. की हिंदुत्व विचारधारा, जो हिंदुओं को अन्य धर्मों और आस्थाओं से बेहतर मानते हैं उनका कहना है कि वे लोगों को परिवर्तित नहीं करते हैं लेकिन उन्हें उनके मूल विश्वास पर लौटने में मदद करते हैं। विहिप के उपाध्यक्ष चंपत राय के अनुसार, संगठन की स्थापना का प्राथमिक उद्देश्य “घर वापसी” अभियान है, जो स्थानीय जाँच सूत्रों का कहना है कि यह एक समस्या है जो मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और आदिवासी समुदायों को घेरती है, जो बहुत ही गरीब हैं और या तो वे बिलकुल अनपढ़ है या बहुत ही कम शिक्षित हैं। झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के आदिवासी राज्यों को आमतौर पर घर वापसी समारोहों के लिए बड़े केंद्र के रूप में जाना जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश को, अनुसूचित जाति के उच्च घनत्व के कारण ऐसी घटनाओं की सबसे अधिक संख्या दर्ज करने के लिए जाना जाता है। जबकि घर वापसी को प्रभावित करने वाले कारक जटिल और कठिन हैं, कुछ रुझान, हिंदू राष्ट्रवादियों के समूहों द्वारा इस्तेमाल किए गए तरीकों को प्रकट करते हैं। सोशल मीडिया प्रचार और भय की रणनीति को शामिल करते हुए, उनके अभियान मौलिक स्वतंत्रता और अधिकारों को कमजोर करते हैं।

घर वापसी बयानबाजी में चित्रित एक सामान्य विधि पुनः परिवर्तन की संख्या के बारे में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे करना है। 15 मार्च 2021 को गढ़वा जिला, झारखंड में नवभारत टाइम्स ने रिपोर्ट किया कि 35 आदिवासी परिवारों के 181 लोगों को “सरना” (प्रकृति पूजा) के लिए वापस लाया गया, जिसे स्थानीय जांच सूत्रों ने संख्याओं की अतिशयोक्ति के रूप में खारिज कर दिया है। हिन्दू राष्ट्र का उद्देश्य प्रगति कर रहा है, यह बात दर्शाने के लिए सोशल मीडिया पर ऐसी ख़बरों के पुनः प्रसारण किया जाता है यह दर्शाते हुए कि जैसे यह एक हालिया घटना है जिसका उपयोग समर्थकों का विश्वास हासिल करने के लिए किया जाता है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, एक वीडियो के प्रचार में, खाला गाँव, धुर्की जिले, झारखण्ड में २७ मसीहियों के घर वापसी के बारे में सोशल मिडिया में दोहराया गया जिससे वे जनता को गुमराह कर सके, जबकि सत्य यह था कि केवल ६ लोगों को पुनःवापसी की गयी थी।

कई बार, घर वापसी को उचित ठहराने के लिए झूठे आख्यानों की रचना की जाती है, जिससे आदिवासी समुदायों को ईसाई धर्म को बदनाम करने और इसे खुलकर बताने के लिए मजबूर किया जाता है। 16 मार्च 2021 को, झारखंड के चतरा में लगभग 50 आदिवासी महिलाओं और पुरुषों को यह कहने के लिए विवश किया गया था कि उन्हें ईसाई धर्म में प्रलोभन के द्वारा लाया गया था और अब वह पुनः अपने धर्म में जाने का निर्णय ले चुके हैं। स्थानीय जाँच सूत्रों का कहना है कि इस तरह के परिणाम हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा प्रतिशोध लेने के डर के परिणामस्वरूप लगातार उत्पीड़न के रूप में सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए,”धर्मांतरण” को मातृभूमि में घुसपैठ और हिंदू धर्म के पूर्व-अस्तित्व के लिए एक संभावित खतरा माना जाता है। आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार अल्पसंख्यकों को घुसपैठियों के रूप में संदर्भित करते हुए हिंदुओं को धर्मांतरित नहीं करने की चेतावनी दी थी। चूंकि राज्य चुनावी प्रक्रिया में राजनीतिक बिंदु हासिल करने के लिए भाजपा के खेमे से धर्मांतरण पर बहस जारी है, भारत का धर्मनिरपेक्षता का ताना बाना विघटित हो रहा है जिसका प्रतिकूल प्रभाव विचार, विवेक और धर्म के चुनाव की स्वतंत्रता पर पड़ रहा है। एक खेल के मैदान के साथ जो भारतीय संविधान के वास्तुकारों द्वारा परिकल्पित किया गया था, लोगों की आत्मा के लिए लड़ाई उन नियमों पर आधारित है जो हिंदू राष्ट्रवाद द्वारा तय किए गए हैं और जो सम्पूर्ण मीडिया को नियंत्रित करते है, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों को अधीनता में रहने के लिए धमकाते हैं।